जीवन का माधुर्य
सिमटा उन क्षणों
जब नेत्र मिलकर
रूक से गऎ
अद्भुत अहसास
ह्रदय मे संजोए
इक मिठास
मिटे नही मिटे
क्षण अनमोल
खोजें न मिले
प्रेम से उपजे
मोल नहीं मिले
जीवन की पूंजी
है बस उनमें
मुहब्बत है उधव
बंदगी वह नहीं 🌷
क्या बोलू ...यह महज़ एक सवाल नहीं हैं ...न ही बस एक विचार ...ये दो शब्द मिल के हर बात को नयी पहचान देते हैं , ऐसे दो राहों को सामने लाते हैं जहा खुद के विवेक का प्रयोग करना ही पड़ता हैं ...बात चाहे किसी सवाल के जवाब देने की हो या फिर खुद को बताने की , या ही दूसरों को सामने लाने की, हर बार मन में ,जबान में पहली सोच ,समझ और शब्द की आवाज और आगाज़ बनता हैं यही की ....क्या बोलू ?????
जीवन का माधुर्य
सिमटा उन क्षणों
जब नेत्र मिलकर
रूक से गऎ
अद्भुत अहसास
ह्रदय मे संजोए
इक मिठास
मिटे नही मिटे
क्षण अनमोल
खोजें न मिले
प्रेम से उपजे
मोल नहीं मिले
जीवन की पूंजी
है बस उनमें
मुहब्बत है उधव
बंदगी वह नहीं 🌷
विश्व मे कितनी भीड़
अथाह सागर है लोग
मिलते जुलते रहते हैं
अनेकों से हर रोज
दो नयन वो अनजान
भीतर जैसे कोई तीर
अंतर्मन को झकझोर
अंकुरित एक नवदीप
क्यों कर बनते रिश्ते
बिन कारण व उद्देश्य
अद्भुत उमंग कर वो
भर जीवन मे हिलोरें
क्यों कर खोजें उन्हें
नेत्र भरे खालीपन को
अपने लगते क्यूं कोई
स्वयं देख नेत्र अन्यत्र🌷
प्यार की मूर्ति प्रेमिका
ममता की छांव मां
दो रूप मे संवारती
ईंटों कोठरी के घर
कुछ देर न हो जो घर
सब ठहर जाए सब
वरना तो यूं है लगता
क्या करतीं रहती है
आवाज से गूंजती हैं
बहुत बोलती है यह
कदाचित जो न हो
तो सन्नाटा पसरा रहे
पलभर मे अश्रु धारा
समेटे हुए अपार भाव
नर्म है ह्रदय से यह
चोट सह न कर पाए
इतनी अजीज दुनिया
बनाकर फिर खुदा ने
प्रेम ममता व धीरज्
भरकर ही स्त्री बनाई
इनहे अगर समझना
शब्दों पर ना जाना
पढ़ कर इनकी आंखे
इनके भाव पहुंचना
कुछ भी सह लेती
अपार कष्ट यह
पर चोट विश्वास की
उन्हें है न गुजारा
अनमोल है यह रिश्ते
मोम से है सब नाजुक
कठोर है पुरुष दुनिया
इनको संभल निभाना🌷
मिट्टी उभरे तन
ओढ़े हुए मन
संसार विचरण करते
लपेटे विचार दर्पण
इतने व्यस्त हम
लगता यूं जैसे
अनंत खेल यह
सब कुछ सत्य
बोले कृष्ण गीता
मैं ही मिट्टी से
आत्म रूप धारण
सर्वत्र हूं विचरता
स्पष्ट अध्याय १५
कितने ही तत्वदर्शी
बिन पवित्रता कोई
दर्श मुझे न पाए 🌷
Mind
A constant companion
running here or there
Needs constant monitoring
like a small child.
Making dreams in air
Of fear or of joy
It's keeping us busy
All the time day night
Dreaming in in sleep😴
day dreaming when awake
It's like a bird in sky
Flying far and nearby
Aided by the mobile 📲
It's further electrified
Chasing in its screen
An imaginary world digitised
Pauses once a while
Making us wonder
What would happen
If the mind stopped by
Saints meditate to still it
But the world of wonder
As an energy of thought
A source of all the feels
The cry of joy
The tear for another
A shoulder to a friend
A eye of concern
All are the colours
of our friend of life
Our dear mind🌷
आज क्यूं कर जश्न लगा
जीवन एक और दिन खिला है
आते जाते कितने लोग यहां
अनेकों रंग और रूप लगाए
कुछ उलझे हिसाब लगाते
कुछ वाद और विवाद बढ़ाते
कुछ मौज मस्ती मे हंसते
कुछ खो जाने का शोक मनाते
बाजीगरी अजब समुख हमारे
उसमें आज नया खेल संजोया
हुई सांझ अब खेल समेटे
रात्रि निद्रा मे फिर स्वप्न देखे
क्यूं कर आज यह जश्न लगा है,🌷
इक आरंभिक सुरूर " मैं"
इक धुंधली सी पराकाष्ठा
अजनबी से माहौल उभार
इक रुदन से उत्पन्न करता
मां के जिस्म से विघटित
इक अलग हुआ एहसास
इक घट में उत्पन्न प्रवास
है अद्भुत यह बसेरा "मैं"
नाजों से संवारा इसे
सबसे पहले रखा इसे
सबसे ज्यादा व पहले "मै
प्रिय में प्रिय बनीं यह "मैं"
"मैं" को टटोलो तो दिखे न
अजब सी पहेली है यह "मैं"
अजीज सबसे कृष्ण की "मैं"
सबको इक धागे पिरोए "मैं"🌷
अचंभित कर रहा जीवन यह
मस्तिष्क पटल पर ख्याल चले
बिन कारण दौड़ लगाते हुए
वन में वानर उत्पात जैसे
कौन हूं मैं , अभिप्राय क्या
इस अनोखे सफर में आकर
क्या खोज में मन नित्य प्रति
इतने गंभीर रूप धारे है यह
नहीं आया समझ में कुछ भी
पूछा जो मुझ जैसे औरों से
मुस्कुराते सब भाग रहे यहां
इक स्वप्नलोक में मरीचिका से
न जाने कब टूटे गा यह
इक मायाजाल इस जीवन का
ठौर नहीं न कोई छोर दिखे
समुद्र में भटकती नैया सा
रचनाकार इस अनोखे सफर के
झलक दिखला इक सौम्य रूप में
तेरे इस विराट रूप में विचलित
विश्राम मिले इस भवसागर से 🌷
।््स््से््स््स््स््से््स््से््स््स््््््
Isn't life funny!
A momentary journey from nowhere to here to nowhere.
Amazing , what for is the great spectre
Everyone looking at it with own mental weave!
Wonder why we are there!
मेरे मन की नन्हीं चिड़िया ...