Monday, 18 November 2013

( एक नीम के पेड़ को अकेले लहलहाते हुए देख कर )

जब भी आता हैं आँखों के सामने
तुम्हारे लहराते पत्तियों का चंचल हरा गुच्छा
सचमुच ,
मेरे मन की खुबसुरती काफी बढ़ जाती हैं |
हजारों रूप –रंग ,भावनाओं को समेटे
कभी धीमे से तो कभी चुप होकर
सहमते हुए कुछ बताना चाहते हो तुम
शायद |
तुम्हारे बगल में खड़े ,गहरे हरे पेड़ की
मचलती पत्तियों से क्या बातें कर रहे हो तुम ?
जरुर कोई खास बात हैं
जोकि
तुम ऊपर उठे और वो झुक कर
कोशिश कर रही हैं तुम्हे सुनने की |
काफी हद तक तुम कुछ कहना चाहते हो
हर उस इन्सान को जो तुम्हारे नीचे से
होकर गुजरता हैं हर ऱोज
निहारता हैं दूर से
शायद कुछ कोरी बाते हैं
जो तुम्हारे ही काग़ज पर आये बिना निशब्द हैं |
तुम्हे तुम्हारी जगह लाने  के लिए
फरसे से लगातार कोशिस करते हैं हम
घास हटाते ,बीज डालते और पौधे लगा कर
शायद ....शायद हमारे स्वार्थ पर ही
कहना चाहते हो कुछ तुम
हमेशा कोशिश करते रहते हो 
हर तरह से
मगर तब तक उसी फरसे से
तुम्हे मिटटी में मिला देते हैं हम |
(यशस्वी दिवेदी )


Wednesday, 17 April 2013

लम्बी कतार .....


Monday, 11 March 2013

एक गुजारिश ...




तुम्हारे चेहरे  की  हर लकीर का मतलब खूब समझ जाती हूं  मैं
तुम कहो  न कहो
उसपे हलकी सी  ख़ुशी का भीगा समन्दर
लहरों की करवटों की सुनी आवाज
मेरे  साहिल को सुलझा जाती हैं
लेकिन शर्त बस इतनी सी हैं
कि चेहरा दिखा  दिया करो |

यशस्वी ...

Monday, 28 January 2013

कुछ कच्चे -पक्के ख्याल ....आपके साथ


रात के आशियाने में एक चमक सी देखी
एक टूटे तारे की झलक सी देखी
मकसद ये नही था की कुछ मांगना  चाहती थी
मैं उससे जो खुद किसी और के लिए टूटा था
मैं तो तलाश रही थी खुद की झलक
जिसमे सिर्फ मैं और मेरी झलक का जूनून था
कुछ जुगनू आये और आते रहे
कुछ का नामो - निशान
अभी भी उस गुम -सुम पेड़ पे अटका हैं
जहा कभी उनका गुलज़ार होता था
एतबार होत़ा था
एक अधूरी सी कहानी हिसाब
मांगती हैं उन सारे  बिखरे पलों का
जब हम दोनों साथ बैठे थे
जहा वो थी मेरी सहेली मगर मैं उसकी कोई नही
खुली किताब का हर पन्ना ,हर पल
एक आहट  के साथ आकर सिकुड़ जाता हैं
जहा मैं अपनी तन्हाईयों मैं खो जाती हूं
है जरा चंचल सा मन मगर ,कठोर नही
बीएस हर  आश  को पूरा करना करना
और उसमे जी लेना चाहती हूँ
एक हलकी सी छुवन ,उस नर्म   पौधे की
जो खुद ही सिसक रहा हैं
पाने को बेताब नही मगर
उससे रु -बरु  होना चाहती हूँ
शायद ,
निर्भय मन की ये एक और ख्वाहिश हैं
एक पैगाम हैं ये आखिरी तो नही
मगर हा आखिरी से कम भी नही,,,,,
                                                                यशस्वी दिवेदी


Thursday, 1 March 2012

आवाज दो तुम खुद को आज

                                                                         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
     
          सोई हुई  है सोच क्यों ..
         दबे -दबे क्यों है आरमान
         इनको कब तुम जागाओगे
        तुम बहुत कुछ  कर ले जाओगे  

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
      
         सपनो की दुनिया सपनो तक
         बस यूँ  ही न सीमित रहे
         खाली पूरी जमीन पर बस लिख दो
          तुम अपना ही नाम

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         क्यूँ  किये है बंद इसके किवाड़
         आओ खोल दो इन्हें तुम आज
         किस बात का है इंतजार
   
         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         बस नाम का मत काम करो
         काम से ही नाम करो
         फिर देखो क्या होता है आज

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

            बस एक कदम की  दूरी पर  
            है खड़ी तुम्हारी  मंजिले
            बढ़ा दो  ना  तुम ये  कदम
            क्यू थमे -थमे है ये पड़े

          आवाज दो तुम  खुद को आज
          आवाज दो तुम खुद को आज ।

             पूरी श्रृंखला तुम्हारे बिन
            सूनी-सूनी है पड़ी हुई
            एक उंगली बढ़ा कर तुम
            करते नही हो क्यूँ आगाज

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

           सीमित सजा है ये गगन
           सीमित  पड़ी है ये धरा
           सिमटी हुई  है  साडी दिशा
           तुमसे ही है इनका विस्तार

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

             डाल  दो हौसले का रंग
             उड़ेल दो अपना प्रयास
             हर तरफ जगमगायेगा बस
             बस तुम्हारा ही तुम्हारा प्रयास

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज  

        ( आज कुछ ऐसा ही ख्याल आया की हम अपनी ही आवाज को क्यों नही सुनने की कोशिश     
        करते  जबकि हम चाहते है की दुनिया हमारी  आवाज को पूरी तरह सुने ...सच मे कितना  
         अजीब सोच लेते   है कभी -कभी हम ।।_)

Monday, 13 February 2012

१०\१\२०१२---------------दिवा बेन (गाँधीआश्रम स्कूल शाला -१)

आज 
ASP का पहला सप्ताह और पहली VISIT  थी |जैसा की मैंने हर सप्ताह मे २ visit  बनायीं थी ६ सप्ताह के लिए मगर जब आज दिवा बेन के साथ शेयर किया तो उन्होंने कहा -
(क)--एक हप्ते मे २ बार तो संभव नही हो पायेगा क्योकि जब आप आते हो तो मेरी पूरी कोशिस होती है की  सारा टाइम  आपको दे पाऊ जिसकी वजह से कुछ काम  रुक जाते है |और बाकि दिन तो मे जाती ही हूँ |
(ख)--आज का जो मेरा पहला
objective  था ( क्लेअर कांसेप्ट ऑफ़ गोइंग  क्लास ) इस पर जिन बिन्दुओ पे बात हुयी वो  इस प्रकार थे ----

(क)-----मैंने कहा की जैसा आपने वर्कशॉप मे कहा था की आप गणित इसलिए पढाना चाहती है क्योकि --बच्चे कमजोर होते है ,और समझ नही पाते? तो आपको क्या लगता है की  शिक्षक पढ़ा नही पाते या फिर   बच्चे ही पढ़ नही पाते(असमर्थ )है |

उन्होंने कहा -आधे बच्चे तो कमजोर होते है क्योकि वो ध्यान ही नही देते ,उनकी रूचि ही नही होती इसलिए वो सिख  नही पाते और कुछ शिक्षक तो काफी अच्छा पढ़ते है जिससे की बच्चे जल्दी सिख पाते है |

(ख )----मैंने कहा ठीक है मगर जिन बच्चो की रूचि ही नही है उन्हें कैसे  पढाया जा सकता है जिससे  उनकी रूचि  भी जागे|और जो बच्चे जल्दी शिख पाते है उसके पीछे क्या वजह हो सकती है |क्या इसपे हम आप  शिक्षक मिलके कुछ  शेयर कर सकते है|
उन्होंने कहा की हा कर सकते है क्योकि अगर वे बच्चे पढना नि छह रहे है तो खेल के द्वारा भी कुछ किया जा सकता है | मैंने कहा   की  क्या सिर्फ अंको से ही गणित शिखाया जा सकता है क्योकि खेल तो  लगभग हर बच्चे को पसंद होता है |

(ग )---उन्होंने कहा कुछ बच्चे तो इसलिए नही सिख पाते क्योकि उनके साथ  बहुत साडी परेसनिया होती है और कुछ बच्चे तो पांचवी के बाद भी  नही सिख  पाते|

मैंने पूछा की फिर वो बच्चे आगे की क्लास मे कैसे चले जाते है  उनका उत्तर  था की---
(क)--४ परीक्षाये होती है जो की २५-२५ नंबर की होती है | उसमे जैसे  मौखिक परीक्षा होती है तो बच्चे को जब मुह से बोलकर प्रसन पूछो तो उसे वार्ता की खबर  पड़ती है और वो समझ के जवाब दे पता है जबकि लिखित मे वो कम या तो समझ ही नही पाता|

मैंने कहा की जो बच्चे रूचि नही लेते या नही समझते तो क्या उनके लिए "वार्ता " वाली पढाई  का अवसर नही दिया जा सकता |उन्होंने कहा की हा सायद इससे कुछ हो पायेगा
(ख )---गणित की क्लास  मे वो शिक्षक के साथ ही जाएँगी इससे -------
       जब मे  क्लास लुंगी तो  शिक्षक जिन बच्चो को नही आता उनके साथ ज्यादा समय दे पाएंगी        और यह भी समझ पाएंगी की मे कैसे पढ़ा रही हु |

(ग )--मैंने कहा की हा आप दोनों एक -दुसरे के साथ शेयर भी कर सकती है और प्लानिंग भी साथ -साथ कर सकती है |
(घ )--टीचर सप्पोर्ट की बात पे उन्होंने कहा की----------

(क )-----मे टी अल ऍम ,ग्रुप-विभाजन के माध्यम से ,उनके कक्षा की समस्याओ के बारे मे बात करके उन्हें सप्पोर्ट  करती हु मगर कुछ के साथ करना भी चाहती हु तो  नही कर पति क्योकि वो मुझे कही से भी सप्पोर्ट नही करती |

मैंने पूछा -मतलब ?
जब टीचर मन से करना ही नही चाहती तो मे कैसे करू ,मे तो किसी भी टीचर के साथ एक घंटा  ही रह सकती हु मगर टीचर का मानना  है की
 (क ) --- उससे कमजोर बच्चे ही मिले है |अच्छे बच्चे उनके पास नही है |

मैंने कहा की आप एक बार अकेले मे उनसे बात करके देखिये की उन्हें क्या परेशानी है ?क्या वजह है
उन्होंने फिर कहा की ---कुछ टीचर तो बहुत अच्छा करती है ,बच्चे हमेशा शिखने को तैयार रहते है

(ख )---क्लास मे रेगुलर जाने की बात पे उन्होंने कहा की --हा अभी तो मे रोज ही जाती हु |
आज प्लानिंग शेयर करते वक़्त मुझे लगा की उनकी काफी रूचि थी \
------------एक बात मेरे मन मे थी मगर मे उनसे पूछने के  क्लेअर नही थी की ---
आप क्लास तीसरी के उस शिक्षिका के साथ ही क्लास लीजिये न जिन्हें लगता है की उनके पास कमजोर बच्चे है \
आज क्लास मे जाने को भी था मगर नही हो पाया क्योकि प्रक्टिकल लर्निंग  के  लिए बच्चो को स्कूल के पीछे घुमाने ले गए थे |

(ग ) ---आज  उन्होंने मुझसे थोडा और डिटेल मे खुल के बताया और आज कम्मुनिटी मे भी गयी और पहला दिन सिर्फ  थोड़ी बहुत लोगो से बात -चित हुई |


Wednesday, 9 November 2011

मन ने कहा

बहुत दिनों के बाद अपने चलती -फिरती जिन्दगी के किताब मे अचानक झाकने का मन किया तो रुख मोड़ लिया .
उम्मीद है की ये सिलसिला  अब बरक़रार रहेगा..........तो क्यों न अब अपनी बाते साझा करू .....

              सुना है की बाते बाटने से......................?
              ये भी बताने की  बातं है क्या .......
मै अपने कुछ ऐसे अनुभव  लिखना चाह रही हु जिनका अनुभव  मुझे अभी मिला मेरे स्लम   की यात्रा के दौरान ................

वहा जाने से पहले मन मे तरह -तरह की बाते ,थोडा डर,थोड़ी उत्सुकता  और क्या पूरा एक महिना मै वहा रह जाउंगी  पुरे मन से या फिर कोई मज़बूरी तो नही होगी ............
जाने के लिए जब घर से निकली और वह तक पहुचते पहुचते मेरा मन हवा से भी तेज भाग रहा  था कारन  शायद जिन्दगी को बहुत ही नजदिग से देखने का मौका मिल रहा था और खासकर उन सारे सवालो को जानने का मौका जो शायद तब से मेरे मन  मे  तब से उमड़ रहे थे  जब से मैंने सड़को के एक किनारे खाली मगर वह से भी हटाये जाने , किसी की दुत्कार ,और रात के अँधेरे मे चूल्हे  मे अपना पेट भरने के लिए ,जलाई गई आग मे सिर्फ धुवा इसलिय फुक रहे होते है क्युकी जीने के लिए जरुरी  है शायद .
छुक छुक  करती रेलगाड़ी  मे से जितनी भी बार मेरी नज़र  उन घरो पे पड़ती थी जिसे जमाना  झुग्गी -झोपड़ी कहता है ..........और एक दफा मुह सिकोड़ लेता है .शायद घर की एक निश्चित परिभाषा तय कर दी गई  है   एक बंगला बने प्यारा सा  की भावना के साथ ..........यित पत्थरो की चार दिवारी और रंग -बिरंगे चुने से पोती हुई ..........
मे भी इन से अछूती खा रही ,मे भी तो हर दफा यही सोचती  थी की आखिर इन मे रहने वाले लोग कैसे अपनी जिन्दगी आराम से बिताते होंगे  और भी कई सरे सवाल ..................
और इन सब का जवाब मिलने का सिर्फ  एक ही रास्ता था जो  सिर्फ और सिर्फ उनके बीच  जाकर के  ही आगे बढ़ता था और ख़ुशी की बात की ये थी की मुझे वह  रास्ता  दिख  गया था  जहा  जाने की   की मेरी इच्छा  कही न कही मेरे मन मे अनचाहे रूप से  दबी हुई थी ..........


                  

Wednesday, 20 July 2011

कठपुतली का खेल

कठपुतली का खेल, गाँव नगर, राजदरबार या धर्मस्थलो में आमिर गरीब, शिक्षित अक्षित जनता में सामान रूप से प्रदर्शित होते चले आ रहे है. कथापुँतली प्रदर्शन से जहा जनता का मनोरंजन होता है  वही इसके कथानक में धार्मिक आडम्बर दहेज़ प्रथा , बेमेल विवाह , अशिक्षा और कुपोषण जैसी सामाजिक समस्यावो का समावेश कर इनका समाधान करने की प्रेरणा भी प्राप्त होती है. कठपुतली प्रदर्शक अपने मनोभाव को इनके अभिनय के द्वारा व्यक कर आत्म प्रदर्शन करते है...

पारंपरिक लोक माध्यम

पारंपरिक लोक माध्यम का जन्म आदि काल से ही हुआ है .जब मनुष्य संचार का मतलब नहीं जनता था तभी से ये माध्यम अस्तित्व में है सभ्यता के विकाश से ले कर मुद्रण यन्त्र के अविष्कार तक यही माध्यम सन्देश प्रशारण का कार्य करते थे . संचार का यह सर्वाधिक प्रभावी माध्यम है इन माध्यमो के द्वारा पढ़े लेखे तथा अनपढ़ दोनों ही समूहों में सार्थक एवं प्रभावी ढंग से सन्देश पराश्रित किये जा सकते है. इन माध्यमो के अंतर्गत धार्मिक प्रवचन कथा ,वार्ता , संगीत , लोक संगीत ,पर्यटन , यात्रा वृतांत ,नाटक आदि आते है .]
                                         इन लोक माध्यमो की सबसे बड़ी विशेषता है की मनुष्यों द्वारा उस समूह की संस्कृति, भाषा,परिवेश अवं रूचि के अनुरूप संदेशो का सम्प्रेषण किया जाता है जिस समूह में संदेस पराश्रित करना होता है .जनसंचार के पारंपरिक लोक माध्यम आदि कल से ही अस्तित्व में है .

Saturday, 16 July 2011

दयामृत्यु

७ मार्च २०११ को इक्षा मृत्यु या युथेजेनिया पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया नर्स अरुणा रामचंद्र शानबाग के मामले पर कोर्ट ने दया मृत्यु देने वाली याचिका ख़ारिज कर दी और कहा की चेतन दयामृत्यु गैर कानूनी है लेकिन अति विशेष परिश्थितियों में अचेतन दया मृत्यु को अनुमति दी जासकती है .
           इस फैसले के बाद भारत दुनिया के उन चुने हुए देसों में शामिल हो गया है जहा किसी न किसी रूप में दया मृत्यु को कानूनी मान्यता मिली हुई है ,अब तक यह कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित था. चेतन दया मृत्यु केवल ऐसे मरीजो के लिए होगी जिसका ब्रेन पूरी तरह मृत हो गया हो या स्थायी रूप से निष्क्रिय अवस्था में आ गया हो और कुछ भी करने में अक्षम हो
           दया मृत्यु को सामान्य तौर पर युथेजेनिया के रूप में जाना जाता है जिसमे असहनीय दर्द एवं पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए लोग अपनी इक्षा से मृत्यु का वरण करते है...

Friday, 27 May 2011

                    कूड़े में पलता सपना 
देश समग्र व उत्तरोत्तर विकास के लिए शिक्षा अकात्य हथियार है |इसके मद्देनजर ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शिक्षा के बजट में २४% की वृद्धि की और ५,२०,५२७ करोण रूपये का प्रावधान उच्च शिक्षा के लिए तय किया |ताकि चीन, रूस,अमेरिका,ब्राजील की भाति भारत भी शिक्षा का स्तर ऊँचा उठा सके और २१वि सदी का सपना पूरा कर सके|मगर अफ़सोस की बात यह है की यह सब मानक जिनके लिए तय किया जाता है वह भविष्य के कर्णधार आज भी उन्ही गंदे ,मलिन बस्तियों ,तालाबों या फिर रेलवे ट्रेक के किनारे पुरे शहर के कूड़े को उठाकर एक वक्त के लिए रोटी-नमक का इंतजाम कर पाते है |जिनके हाथो में कलम होनी चाहिए उनके हाथ शहर की गंदगी से सने पड़े है|ऐसी स्थिति में "सर्व शिक्षा अभियान "मुक्त ,व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की सफलता की माला जपना कहा तक सही है|जबकि यही बच्चे हमारे समाज की "नीव "है |और अगर ये दिन -रत सिर्फ बोरियों में कूड़ा ही बीन रहे होंगे तो उनसे की जाने वाली उम्मीदें भी कूड़े के ढेर में समाधी ले लेंगी|अतः आवश्यकता है की सरकार के अतिरिक्त हम सब भी मिलकर छोटे -छोटे प्रयास करे की इस समस्या का कोई विकल्प निकल सके |                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           यशस्वी द्विवेदी
 

Thursday, 5 May 2011

कक्षा ६ में जब मुझे  पहली बार बिना गलती के घर में डांट पड़ी तो भगवान के सामने मेरी आंखे डबडबा गयी और अहसास हुआ की कही ये मेरी उम्मीदों का अंत और मेरे जीवन के आशा की आखिरी सांस तो नही ............   मन में एक उथल -पुथल ,आँखों में बचैनी और आँखे खोज रही थी कुछ ऐसा जहा मै मन की बात भगवान के सामने रख सकूँ |  किन्तु शर्त थी की अंतिम साँस के पहले ........................ 
                                                                 और छोटे -२ उन हाथो ने शुरुआत की अपने अंतिम साँस के थमने की और मन समर्पित हुआ -'इश्वर के प्रति '...........

                                   अंतिम सांसे 

      कुछ मेरे जीवन की अंतिम सांसे                                    |
            गिन-गिन कर मै बिताऊ                                               ||
            इस छोटे से आंगन में मै झूम-झूम के गाऊ                     |
            होंगे कभी क्या सपने मेरे पूरे इस आस से मै क्या सुझाऊ ||
            देख-देख के मै मस्त पवन को                                         |
            मै क्यों इतनी सी रिझाऊ                                                ||
            हे ,परमात्मा देना तू शांति 
                    बस इतनी सी आस लगाऊ                                    
           बांध पैर में ऐसे नुपुर जिसमे हो कोई अद्भुत झंकार          |
          जो है निराकार उसी की धरा पर
                                                    मै जीवित हिकर गाऊ          ||
          कभी इधर-इधर ,कभी...कभी उधर-उधर                        |
               ऐसा अनुमान लगाकर मै स्वयं का दीप जलाऊ          ||   
         यह है दीप नही अंगार ,जो तुमसे न देखा जाय                  |
         करो संतोष इसी में तो ,बलिहारी घर मै जाऊ                   ||
         है यही मेरी जीवन गाथा                                                  |
         इसी को नमाऊ मै अपनी माथा                                       ||

Monday, 2 May 2011

                 खुद से खिलवाड़ क्यू


लाख कोशिशो के बाद भी आज हम क्यू अपनी योजनाओ को मूर्त रूप में स्थापित नही कर पा रहे है |या तो हम अनजान है या फिर जन बुझकर खुद को सिर्फ सड़क पर दौड़ लगाते ,या फिर सिगरेट के धुए में उड़ाते हुए अपनी भविष्य  को नजर अंदाज करने पर आमदा है|क्यू हम स्वर्ग के अस्तित्व पर एक विश्मयबोधक प्रश्नचिन्ह लगाकर "टेक ईट इजी " का लेवल लगाये हुए खुद को सरेआम बेरोजगारी ,अशिक्षा के हाथो मुफ्त में नीलाम करने पर तुले हुए है |
                      देश के समग्र विकास के लिए जहा हर संभव प्रयास सरकार के द्वारा किया जा रहा है वही समाज और सामाजिक प्राणी कहे जाने वालो में से बीज से लेकर फल तक सब अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत ना होकर सिर्फ अलग -२ राग अलापे जा रहे है|
                     कही ठेले को तेज से खीचते जा रहे भावी कर्णधार पान-मसाला वालो को देखकर "मुन्नी बदनाम हुई "और सिटी बजाकर निकल जाते है तो कही दूसरी ओर साईकिल से जाते एक लड़की के पीछे मंडराते हुए कुछ भौरे "शीला की जवानी "को गुनगुनाने में ही सारा समय बिता देते है| कही बस की सीटो पर बैठे विद्द्यार्थी सिर्फ सिविल लाइन्स का टिकट लेकर झूंसी तक की यात्रा को पार कर लेते है,तो कही परीक्षा देकर लौटा छात्र अपने मित्रो को यह जताकर कि पढाई कि आड़ में वह किस कदर अपने मजबूर माता -पिता को बेवकूफ बनाकर शराफत कि टाई को हर समय मेंटेन किये हुए है |ऐसे नाजुक स्थिति के मद्देनजर अगर आप भारत जैसे वृक्ष के ये जड़, अपनी नीव खुद से कमजोर करने पर तुले हुए है तो कैसे उम्मीद कि जाये कि बौर भी आयेंगे और फल भी मिलेगा |अगर समय रहते हम खुद कि जिम्मेदारी नही समझे तो शायद वह दिन दूर नही कि आज हम सड़क पर भिखारियों को हट्टे -कट्टे होने का ताना देते है,कल उनकी ही श्रेणी में न पहुच जाये क्योकि वर्तमान और भविष्य के बीच अगर सुधार व तालमेल न रखा गया तो यह हमारे लिए एक अबूझ पहेली होगी और हमेशा हलचल पैदा करती रहेगी |

                        अतः आवश्यक है कि हम अपने आज और कल का भली-भांति मुल्यांकन करे और खुद के साथ खिलवान ना करे |





                                                                                           यशस्वी जी 

 

Sunday, 1 May 2011

ASLI MILAN

                                                         असली मिलन

जिन्दगी की कली अभी तक सुखी ही पड़ी थी 
           उसमे काँटों का आना बाकि था 
आंधी रात को आंसमां के उस छोर पर              
           चंद्रमा का जाना बाकि था
इंतजार था सभी जगत के लोगो को 
क्योकि.........
 नदियों का मिलना अभी तक जो बाकि था
 प्रत्येक पहर पर चारो दिशायों में 
 कमलियों का श्रृंगार अभी बाकि था 
     प्रतीक्षा थी प्रतीक्षा की श्रृंखला में 
         अवशेष बनकर रह गयी 
    कभी,कभी अचानक 
           मुझे तुम्हारा साथ मिला 
किन्तु,
दुर्भाग्य है वो  नजारा बहुत समय के बाद मिला 
जिसकी तलाश पर मै भटकती रही थी
जिसकी आस पर मै तड़पती रही थी
वही छोर आज न जाने -
                कितने दिनों के  बाद मिला

चाहती हूँ तुमसे .........
कभी  अलग न मै रहू 
किन्तु ,
सफलता का जो झरोखा सा एक बन गया है 
उसे विस्तृत रूप देने का जो संकल्प लिया है
उसके लिए यदि तुम और मै,

एक दुसरे से आज अलग होते है 
तो विस्वास करो  इसे अलग नहीं 
बल्कि ...........
मिलना इसी को कहते है
  

                
                                      YASHASWI DWIVEDI
                                                        
 

Wednesday, 27 April 2011

Monday, 18 April 2011

मॉम नहीं माँ..............


मातृभाषा   किसी भी देश, राष्ट्र की व वहां  के लोगो का वह पहला आभूषण होता है जिसे उनको व्यक्तित्व की पहचान मिलती है! जहा एक ओर हम अपनी मातृभाषा हिंदी को भूलते हुए नजर आ रहे है वही दूसरी तरफ सौतेली आंग्ला भाषा से नजर मिलते नहीं थक रहे है! क्या यही है हमारी संस्कृति की सभ्यता जिसकी सीमा रेखा को पार  करने का दुस्साहस हम कर रहे  है !
               जब तक हम अपनी भाषा का सम्मान करना  नहीं सीखेंगे तब तक भारत्वर्सोनती की कलपना से कोसो दूर रहेंगे! हम क्यों नहीं समझ रहे क़ि जब अपनी  माँ के स्थान पर दूसरी माँ को हम फूटी आँखों नहीं देख सकते तो राष्ट्र भासा पर विदेशी  भाषा क़ि  हुकूमत कैसे  सह सकते है ! और आज के आधुनिकरण के दौर में हम अपनी भाषा को पीछे छोड़ कर इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुकुट सजा रहे है वही १४ सितम्बर को हिंदी दिवस पर  बुद्धिजीवियों के   विचारो, उनकी भाषा के प्रति लगाव उत्थान प्रक्रिया को बताते है!!!!!!! फिर दुसरे दिन ऐसे विकास करने पर भाषा क़ि महत्ता कितने अनुपात में बढ़ी इसका आकलन हम स्वयं कर सकते है !!आज  क्रन्तिकारी दौर में भी यदि हम नहीं जागेंगे तो फिर भाषा के सूर्योदय को हमेशा सूर्यास्त के अँधेरे में ही पयेंगे और इसके महत्व को बढ़ाने के लिए किये गए सरे प्रयास निर्थक सिद्ध होंगे .........................

                                                     अतः आज युवा वर्ग को सामने आना होगा अन्य भाषाओ के प्रयोग के साथ साथ अपनी मात्र भाषा को सर्वोच्च स्थान देना होगा तभी हम कह सकेंगे क़ि-     
"गायन्ति देवा किलगीतकानी   ध्यास्तुते स्वर्गापर्द्गार्स्परा भार्ग भूते भूयः भवन्ति पुरुषाशुरात्त्वात"..............
  अगर देवतओं के इस अभिव्यक्ति को समझने में भी हम नासमझी  दिखा रहे है तब भार्तेन्दु हरिशचंद का सोचना क़ि -- निज भाषा उन्नति अहै  सब उन्नति का मूल !!  विन निज भाषा के ज्ञान के मिटे न हिय को शूल.............हम कैसे समझेंगे इसलिए मै सोचती हूँ 'क्याबोलू'...............................   

                                                                                                         
मॉम नहीं  माँ 

Monday, 4 April 2011

dikha diya vishav vijeta hm........

"वह पथ का पथिक कुशलता  क्या जिस पथ में   बिखरे शूल  न हो
नाविक की धर्म परीक्षा क्या जब धाराए ,प्रतिकूल  न हो ........."

          २८ सालो के बाद जब जीत का सेहरा    हर भारतीय के माथे बंधा तो अनायास ही मुह से निकल ही गया ..........
भारत ने दिखा दिया की आंधी हो या तूफान हम हर हाल में सिकंदर है .........जय हो...........