Thursday, 24 December 2020

Mind🌅

 Mind


A constant companion 

running here or there 

Needs constant monitoring 

like a small child.


Making dreams in air 

Of fear or of joy

It's keeping us busy

All the time day night


Dreaming in in sleep😴

day dreaming when awake

It's like a bird in sky

Flying far and nearby


Aided by the mobile 📲 

It's further electrified

Chasing in its screen

An imaginary  world digitised


Pauses once a while 

Making us wonder

What would happen

If the mind stopped by


Saints meditate to still it

But the world of wonder

As an energy of thought

A source of all the feels


The cry of joy

The tear for another

A shoulder to a friend

A eye of concern


All are the colours

 of our friend of life

Our dear mind🌷

Tuesday, 22 December 2020

जश्न 🌅

 आज क्यूं कर जश्न लगा

जीवन  एक और दिन खिला है


आते जाते कितने लोग यहां

अनेकों रंग और रूप लगाए


कुछ उलझे हिसाब लगाते

कुछ  वाद और विवाद बढ़ाते


कुछ मौज मस्ती मे हंसते

कुछ खो जाने का शोक मनाते 


बाजीगरी अजब  समुख हमारे

उसमें आज नया खेल संजोया


हुई सांझ अब खेल समेटे

रात्रि निद्रा मे  फिर स्वप्न  देखे


क्यूं कर आज यह जश्न लगा है,🌷




Sunday, 20 December 2020

"मैं" 🌅

इक आरंभिक सुरूर " मैं"

इक धुंधली सी पराकाष्ठा

अजनबी से माहौल  उभार

इक रुदन से उत्पन्न करता


मां के जिस्म से विघटित

इक अलग हुआ एहसास

इक घट में उत्पन्न  प्रवास

है अद्भुत यह बसेरा  "मैं"


नाजों से संवारा इसे 

सबसे पहले  रखा इसे

सबसे ज्यादा व पहले "मै

प्रिय में प्रिय बनीं  यह "मैं"


"मैं" को टटोलो तो दिखे न

अजब सी पहेली है  यह "मैं"

अजीज सबसे कृष्ण की "मैं"

सबको इक धागे पिरोए "मैं"🌷













Saturday, 19 December 2020

अचंभित हूं 🌅

 अचंभित कर रहा जीवन यह‌‌ 

 मस्तिष्क पटल पर ख्याल चले

बिन कारण दौड़ लगाते हुए

वन में वानर उत्पात  जैसे 


कौन हूं मैं , अभिप्राय क्या

इस अनोखे सफर में आकर

क्या खोज में मन नित्य प्रति

इतने गंभीर रूप धारे है यह


नहीं आया समझ में कुछ भी

पूछा जो मुझ जैसे औरों से

मुस्कुराते सब भाग रहे यहां

इक स्वप्नलोक में मरीचिका से


न जाने कब टूटे गा यह 

इक मायाजाल इस जीवन का

ठौर नहीं न कोई छोर दिखे

समुद्र में भटकती नैया सा


रचनाकार इस अनोखे सफर के

झलक दिखला इक सौम्य रूप में

तेरे इस विराट रूप में विचलित

विश्राम मिले इस भवसागर से 🌷




।््स््से््स््स््स््से््स््से््स््स््््््















Friday, 18 December 2020

Life🌅

 Isn't life funny!

A momentary journey from nowhere to here to nowhere.

Amazing , what for is the great spectre

Everyone looking at it with own mental weave!


Wonder why we are there!


Wednesday, 16 November 2016

(एक छोटी बच्ची के फ्राक के धानी रंग से प्रेरित रचना )


     रंग ...


रंग भेद नहीं करते
रंगों का भेद बताते हैं
रंग
रंग नही कहते
अपनी सुन्दर परिभाषा |

रंग कहते हैं ..
चुनो ,
खुद के रंग को
जो तुम्हारे रंग से हो मिलता या फिर परे |
रंग आज़ादी देते हैं
रंग सोच देते हैं
रंग देते हैं हौसला
खुद के निर्माण का
रंग ,रंग है |

रंग ने नहीं दिया हक़
उसे बाटने का
रंग मिशाल हैं
खुद की रौशनी तय करने का
रंग ,रंग हैं
रंग भाव हैं |


(यशस्वी)
१६.११.२०१६



Friday, 7 March 2014

                                   
  मेरे मन की नन्हीं चिड़िया ...
नन्हीं सी चिड़िया ...कोमल सी चिड़िया
चंचल चिड़िया ...छोटी चिड़िया
कुछ –कुछ चीजे खोजती चिड़िया
उनसे अपने हर दिन को बुनती चिड़िया |
बरगद के नीचे ,घुमती चिड़िया
मिट्टी से बातें करती चिड़िया
चंचल चिड़िया नटखट चिड़िया
पत्तों से घर को रंगती चिड़िया 
डालियों को सपनों सुनाती चिड़िया |
गीली मिट्टी की दोस्त हैं चिड़िया
अपने मन का होश  हैं चिड़िया
पंखो में  दुनिया बसाती चिड़िया
तारों को झूला झुलाती चिड़िया |
हर मन की हलचल हैं चिड़िया
चंचल चिड़िया ...छोटी चिड़िया
(यशस्वी )
४/३/१४



Tuesday, 4 February 2014

( रात से गहरी दोस्ती के ख्याल ने कुछ यूँ आवाज दी ...की रात हैं .....)

रात हैं ......
लग रहा है ...रात है 
रात की आवाज पे मत जाओ 
न ही इसके लिबास पर 
रात क्या तभी रात होती हैं ?
जब ,
अँधेरा होता है
जब सन्नाटा छाता है
जब ,
घरों में लोग चुपचाप करवटें बदलते हैं
जब , सड़कों पे हर पल लोग ठिठुरते हैं |
या फिर
जब चूल्हे से घर में उजाला होता हैं
ढिबरी की लौ -तले
बैठा भविष्य का उम्मीदवार होता हैं
या फिर तब ,
जब आँखों को भीचतें ,
पन्नों को जबरन पलटते
अनचाहे मन से पानी के छीटों को
हर दूसरा बन्दा अपने पलकों में भरता हैं
क्या तभी रात होती हैं ...???
पता नहीं कितने हाँ हैं
इसे बयां करने की खातिर
शायद ,
मायने खिसक रहे हैं
भरी रोशनी के नीचे
शोर –हँसी ,ठहाकों में
आधी –आधी रात को |
जिन्दगी को जीते
रात के हर पहर से
उसका हक़ छिनते हुए |
दिख रहा है ....
रात उदास बैठी हैं
मेरे सामने
अपने आँखों के काजल को
नर्म हाथों से कुरदते
होठों के स्याहीपन से
कुछ बुदबुदाते
घूर कर देखती मुझको
कह रही है ----
मैं रात हूँ .....मुझे रात ही रहने दो |

(यशस्वी )

Monday, 18 November 2013

( एक नीम के पेड़ को अकेले लहलहाते हुए देख कर )

जब भी आता हैं आँखों के सामने
तुम्हारे लहराते पत्तियों का चंचल हरा गुच्छा
सचमुच ,
मेरे मन की खुबसुरती काफी बढ़ जाती हैं |
हजारों रूप –रंग ,भावनाओं को समेटे
कभी धीमे से तो कभी चुप होकर
सहमते हुए कुछ बताना चाहते हो तुम
शायद |
तुम्हारे बगल में खड़े ,गहरे हरे पेड़ की
मचलती पत्तियों से क्या बातें कर रहे हो तुम ?
जरुर कोई खास बात हैं
जोकि
तुम ऊपर उठे और वो झुक कर
कोशिश कर रही हैं तुम्हे सुनने की |
काफी हद तक तुम कुछ कहना चाहते हो
हर उस इन्सान को जो तुम्हारे नीचे से
होकर गुजरता हैं हर ऱोज
निहारता हैं दूर से
शायद कुछ कोरी बाते हैं
जो तुम्हारे ही काग़ज पर आये बिना निशब्द हैं |
तुम्हे तुम्हारी जगह लाने  के लिए
फरसे से लगातार कोशिस करते हैं हम
घास हटाते ,बीज डालते और पौधे लगा कर
शायद ....शायद हमारे स्वार्थ पर ही
कहना चाहते हो कुछ तुम
हमेशा कोशिश करते रहते हो 
हर तरह से
मगर तब तक उसी फरसे से
तुम्हे मिटटी में मिला देते हैं हम |
(यशस्वी दिवेदी )


Wednesday, 17 April 2013

लम्बी कतार .....


Monday, 11 March 2013

एक गुजारिश ...




तुम्हारे चेहरे  की  हर लकीर का मतलब खूब समझ जाती हूं  मैं
तुम कहो  न कहो
उसपे हलकी सी  ख़ुशी का भीगा समन्दर
लहरों की करवटों की सुनी आवाज
मेरे  साहिल को सुलझा जाती हैं
लेकिन शर्त बस इतनी सी हैं
कि चेहरा दिखा  दिया करो |

यशस्वी ...

Monday, 28 January 2013

कुछ कच्चे -पक्के ख्याल ....आपके साथ


रात के आशियाने में एक चमक सी देखी
एक टूटे तारे की झलक सी देखी
मकसद ये नही था की कुछ मांगना  चाहती थी
मैं उससे जो खुद किसी और के लिए टूटा था
मैं तो तलाश रही थी खुद की झलक
जिसमे सिर्फ मैं और मेरी झलक का जूनून था
कुछ जुगनू आये और आते रहे
कुछ का नामो - निशान
अभी भी उस गुम -सुम पेड़ पे अटका हैं
जहा कभी उनका गुलज़ार होता था
एतबार होत़ा था
एक अधूरी सी कहानी हिसाब
मांगती हैं उन सारे  बिखरे पलों का
जब हम दोनों साथ बैठे थे
जहा वो थी मेरी सहेली मगर मैं उसकी कोई नही
खुली किताब का हर पन्ना ,हर पल
एक आहट  के साथ आकर सिकुड़ जाता हैं
जहा मैं अपनी तन्हाईयों मैं खो जाती हूं
है जरा चंचल सा मन मगर ,कठोर नही
बीएस हर  आश  को पूरा करना करना
और उसमे जी लेना चाहती हूँ
एक हलकी सी छुवन ,उस नर्म   पौधे की
जो खुद ही सिसक रहा हैं
पाने को बेताब नही मगर
उससे रु -बरु  होना चाहती हूँ
शायद ,
निर्भय मन की ये एक और ख्वाहिश हैं
एक पैगाम हैं ये आखिरी तो नही
मगर हा आखिरी से कम भी नही,,,,,
                                                                यशस्वी दिवेदी


Thursday, 1 March 2012

आवाज दो तुम खुद को आज

                                                                         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
     
          सोई हुई  है सोच क्यों ..
         दबे -दबे क्यों है आरमान
         इनको कब तुम जागाओगे
        तुम बहुत कुछ  कर ले जाओगे  

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
      
         सपनो की दुनिया सपनो तक
         बस यूँ  ही न सीमित रहे
         खाली पूरी जमीन पर बस लिख दो
          तुम अपना ही नाम

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         क्यूँ  किये है बंद इसके किवाड़
         आओ खोल दो इन्हें तुम आज
         किस बात का है इंतजार
   
         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         बस नाम का मत काम करो
         काम से ही नाम करो
         फिर देखो क्या होता है आज

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

            बस एक कदम की  दूरी पर  
            है खड़ी तुम्हारी  मंजिले
            बढ़ा दो  ना  तुम ये  कदम
            क्यू थमे -थमे है ये पड़े

          आवाज दो तुम  खुद को आज
          आवाज दो तुम खुद को आज ।

             पूरी श्रृंखला तुम्हारे बिन
            सूनी-सूनी है पड़ी हुई
            एक उंगली बढ़ा कर तुम
            करते नही हो क्यूँ आगाज

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

           सीमित सजा है ये गगन
           सीमित  पड़ी है ये धरा
           सिमटी हुई  है  साडी दिशा
           तुमसे ही है इनका विस्तार

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

             डाल  दो हौसले का रंग
             उड़ेल दो अपना प्रयास
             हर तरफ जगमगायेगा बस
             बस तुम्हारा ही तुम्हारा प्रयास

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज  

        ( आज कुछ ऐसा ही ख्याल आया की हम अपनी ही आवाज को क्यों नही सुनने की कोशिश     
        करते  जबकि हम चाहते है की दुनिया हमारी  आवाज को पूरी तरह सुने ...सच मे कितना  
         अजीब सोच लेते   है कभी -कभी हम ।।_)

Monday, 13 February 2012

१०\१\२०१२---------------दिवा बेन (गाँधीआश्रम स्कूल शाला -१)

आज 
ASP का पहला सप्ताह और पहली VISIT  थी |जैसा की मैंने हर सप्ताह मे २ visit  बनायीं थी ६ सप्ताह के लिए मगर जब आज दिवा बेन के साथ शेयर किया तो उन्होंने कहा -
(क)--एक हप्ते मे २ बार तो संभव नही हो पायेगा क्योकि जब आप आते हो तो मेरी पूरी कोशिस होती है की  सारा टाइम  आपको दे पाऊ जिसकी वजह से कुछ काम  रुक जाते है |और बाकि दिन तो मे जाती ही हूँ |
(ख)--आज का जो मेरा पहला
objective  था ( क्लेअर कांसेप्ट ऑफ़ गोइंग  क्लास ) इस पर जिन बिन्दुओ पे बात हुयी वो  इस प्रकार थे ----

(क)-----मैंने कहा की जैसा आपने वर्कशॉप मे कहा था की आप गणित इसलिए पढाना चाहती है क्योकि --बच्चे कमजोर होते है ,और समझ नही पाते? तो आपको क्या लगता है की  शिक्षक पढ़ा नही पाते या फिर   बच्चे ही पढ़ नही पाते(असमर्थ )है |

उन्होंने कहा -आधे बच्चे तो कमजोर होते है क्योकि वो ध्यान ही नही देते ,उनकी रूचि ही नही होती इसलिए वो सिख  नही पाते और कुछ शिक्षक तो काफी अच्छा पढ़ते है जिससे की बच्चे जल्दी सिख पाते है |

(ख )----मैंने कहा ठीक है मगर जिन बच्चो की रूचि ही नही है उन्हें कैसे  पढाया जा सकता है जिससे  उनकी रूचि  भी जागे|और जो बच्चे जल्दी शिख पाते है उसके पीछे क्या वजह हो सकती है |क्या इसपे हम आप  शिक्षक मिलके कुछ  शेयर कर सकते है|
उन्होंने कहा की हा कर सकते है क्योकि अगर वे बच्चे पढना नि छह रहे है तो खेल के द्वारा भी कुछ किया जा सकता है | मैंने कहा   की  क्या सिर्फ अंको से ही गणित शिखाया जा सकता है क्योकि खेल तो  लगभग हर बच्चे को पसंद होता है |

(ग )---उन्होंने कहा कुछ बच्चे तो इसलिए नही सिख पाते क्योकि उनके साथ  बहुत साडी परेसनिया होती है और कुछ बच्चे तो पांचवी के बाद भी  नही सिख  पाते|

मैंने पूछा की फिर वो बच्चे आगे की क्लास मे कैसे चले जाते है  उनका उत्तर  था की---
(क)--४ परीक्षाये होती है जो की २५-२५ नंबर की होती है | उसमे जैसे  मौखिक परीक्षा होती है तो बच्चे को जब मुह से बोलकर प्रसन पूछो तो उसे वार्ता की खबर  पड़ती है और वो समझ के जवाब दे पता है जबकि लिखित मे वो कम या तो समझ ही नही पाता|

मैंने कहा की जो बच्चे रूचि नही लेते या नही समझते तो क्या उनके लिए "वार्ता " वाली पढाई  का अवसर नही दिया जा सकता |उन्होंने कहा की हा सायद इससे कुछ हो पायेगा
(ख )---गणित की क्लास  मे वो शिक्षक के साथ ही जाएँगी इससे -------
       जब मे  क्लास लुंगी तो  शिक्षक जिन बच्चो को नही आता उनके साथ ज्यादा समय दे पाएंगी        और यह भी समझ पाएंगी की मे कैसे पढ़ा रही हु |

(ग )--मैंने कहा की हा आप दोनों एक -दुसरे के साथ शेयर भी कर सकती है और प्लानिंग भी साथ -साथ कर सकती है |
(घ )--टीचर सप्पोर्ट की बात पे उन्होंने कहा की----------

(क )-----मे टी अल ऍम ,ग्रुप-विभाजन के माध्यम से ,उनके कक्षा की समस्याओ के बारे मे बात करके उन्हें सप्पोर्ट  करती हु मगर कुछ के साथ करना भी चाहती हु तो  नही कर पति क्योकि वो मुझे कही से भी सप्पोर्ट नही करती |

मैंने पूछा -मतलब ?
जब टीचर मन से करना ही नही चाहती तो मे कैसे करू ,मे तो किसी भी टीचर के साथ एक घंटा  ही रह सकती हु मगर टीचर का मानना  है की
 (क ) --- उससे कमजोर बच्चे ही मिले है |अच्छे बच्चे उनके पास नही है |

मैंने कहा की आप एक बार अकेले मे उनसे बात करके देखिये की उन्हें क्या परेशानी है ?क्या वजह है
उन्होंने फिर कहा की ---कुछ टीचर तो बहुत अच्छा करती है ,बच्चे हमेशा शिखने को तैयार रहते है

(ख )---क्लास मे रेगुलर जाने की बात पे उन्होंने कहा की --हा अभी तो मे रोज ही जाती हु |
आज प्लानिंग शेयर करते वक़्त मुझे लगा की उनकी काफी रूचि थी \
------------एक बात मेरे मन मे थी मगर मे उनसे पूछने के  क्लेअर नही थी की ---
आप क्लास तीसरी के उस शिक्षिका के साथ ही क्लास लीजिये न जिन्हें लगता है की उनके पास कमजोर बच्चे है \
आज क्लास मे जाने को भी था मगर नही हो पाया क्योकि प्रक्टिकल लर्निंग  के  लिए बच्चो को स्कूल के पीछे घुमाने ले गए थे |

(ग ) ---आज  उन्होंने मुझसे थोडा और डिटेल मे खुल के बताया और आज कम्मुनिटी मे भी गयी और पहला दिन सिर्फ  थोड़ी बहुत लोगो से बात -चित हुई |


Wednesday, 9 November 2011

मन ने कहा

बहुत दिनों के बाद अपने चलती -फिरती जिन्दगी के किताब मे अचानक झाकने का मन किया तो रुख मोड़ लिया .
उम्मीद है की ये सिलसिला  अब बरक़रार रहेगा..........तो क्यों न अब अपनी बाते साझा करू .....

              सुना है की बाते बाटने से......................?
              ये भी बताने की  बातं है क्या .......
मै अपने कुछ ऐसे अनुभव  लिखना चाह रही हु जिनका अनुभव  मुझे अभी मिला मेरे स्लम   की यात्रा के दौरान ................

वहा जाने से पहले मन मे तरह -तरह की बाते ,थोडा डर,थोड़ी उत्सुकता  और क्या पूरा एक महिना मै वहा रह जाउंगी  पुरे मन से या फिर कोई मज़बूरी तो नही होगी ............
जाने के लिए जब घर से निकली और वह तक पहुचते पहुचते मेरा मन हवा से भी तेज भाग रहा  था कारन  शायद जिन्दगी को बहुत ही नजदिग से देखने का मौका मिल रहा था और खासकर उन सारे सवालो को जानने का मौका जो शायद तब से मेरे मन  मे  तब से उमड़ रहे थे  जब से मैंने सड़को के एक किनारे खाली मगर वह से भी हटाये जाने , किसी की दुत्कार ,और रात के अँधेरे मे चूल्हे  मे अपना पेट भरने के लिए ,जलाई गई आग मे सिर्फ धुवा इसलिय फुक रहे होते है क्युकी जीने के लिए जरुरी  है शायद .
छुक छुक  करती रेलगाड़ी  मे से जितनी भी बार मेरी नज़र  उन घरो पे पड़ती थी जिसे जमाना  झुग्गी -झोपड़ी कहता है ..........और एक दफा मुह सिकोड़ लेता है .शायद घर की एक निश्चित परिभाषा तय कर दी गई  है   एक बंगला बने प्यारा सा  की भावना के साथ ..........यित पत्थरो की चार दिवारी और रंग -बिरंगे चुने से पोती हुई ..........
मे भी इन से अछूती खा रही ,मे भी तो हर दफा यही सोचती  थी की आखिर इन मे रहने वाले लोग कैसे अपनी जिन्दगी आराम से बिताते होंगे  और भी कई सरे सवाल ..................
और इन सब का जवाब मिलने का सिर्फ  एक ही रास्ता था जो  सिर्फ और सिर्फ उनके बीच  जाकर के  ही आगे बढ़ता था और ख़ुशी की बात की ये थी की मुझे वह  रास्ता  दिख  गया था  जहा  जाने की   की मेरी इच्छा  कही न कही मेरे मन मे अनचाहे रूप से  दबी हुई थी ..........


                  

Wednesday, 20 July 2011

कठपुतली का खेल

कठपुतली का खेल, गाँव नगर, राजदरबार या धर्मस्थलो में आमिर गरीब, शिक्षित अक्षित जनता में सामान रूप से प्रदर्शित होते चले आ रहे है. कथापुँतली प्रदर्शन से जहा जनता का मनोरंजन होता है  वही इसके कथानक में धार्मिक आडम्बर दहेज़ प्रथा , बेमेल विवाह , अशिक्षा और कुपोषण जैसी सामाजिक समस्यावो का समावेश कर इनका समाधान करने की प्रेरणा भी प्राप्त होती है. कठपुतली प्रदर्शक अपने मनोभाव को इनके अभिनय के द्वारा व्यक कर आत्म प्रदर्शन करते है...

पारंपरिक लोक माध्यम

पारंपरिक लोक माध्यम का जन्म आदि काल से ही हुआ है .जब मनुष्य संचार का मतलब नहीं जनता था तभी से ये माध्यम अस्तित्व में है सभ्यता के विकाश से ले कर मुद्रण यन्त्र के अविष्कार तक यही माध्यम सन्देश प्रशारण का कार्य करते थे . संचार का यह सर्वाधिक प्रभावी माध्यम है इन माध्यमो के द्वारा पढ़े लेखे तथा अनपढ़ दोनों ही समूहों में सार्थक एवं प्रभावी ढंग से सन्देश पराश्रित किये जा सकते है. इन माध्यमो के अंतर्गत धार्मिक प्रवचन कथा ,वार्ता , संगीत , लोक संगीत ,पर्यटन , यात्रा वृतांत ,नाटक आदि आते है .]
                                         इन लोक माध्यमो की सबसे बड़ी विशेषता है की मनुष्यों द्वारा उस समूह की संस्कृति, भाषा,परिवेश अवं रूचि के अनुरूप संदेशो का सम्प्रेषण किया जाता है जिस समूह में संदेस पराश्रित करना होता है .जनसंचार के पारंपरिक लोक माध्यम आदि कल से ही अस्तित्व में है .

Saturday, 16 July 2011

दयामृत्यु

७ मार्च २०११ को इक्षा मृत्यु या युथेजेनिया पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया नर्स अरुणा रामचंद्र शानबाग के मामले पर कोर्ट ने दया मृत्यु देने वाली याचिका ख़ारिज कर दी और कहा की चेतन दयामृत्यु गैर कानूनी है लेकिन अति विशेष परिश्थितियों में अचेतन दया मृत्यु को अनुमति दी जासकती है .
           इस फैसले के बाद भारत दुनिया के उन चुने हुए देसों में शामिल हो गया है जहा किसी न किसी रूप में दया मृत्यु को कानूनी मान्यता मिली हुई है ,अब तक यह कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित था. चेतन दया मृत्यु केवल ऐसे मरीजो के लिए होगी जिसका ब्रेन पूरी तरह मृत हो गया हो या स्थायी रूप से निष्क्रिय अवस्था में आ गया हो और कुछ भी करने में अक्षम हो
           दया मृत्यु को सामान्य तौर पर युथेजेनिया के रूप में जाना जाता है जिसमे असहनीय दर्द एवं पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए लोग अपनी इक्षा से मृत्यु का वरण करते है...

Friday, 27 May 2011

                    कूड़े में पलता सपना 
देश समग्र व उत्तरोत्तर विकास के लिए शिक्षा अकात्य हथियार है |इसके मद्देनजर ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शिक्षा के बजट में २४% की वृद्धि की और ५,२०,५२७ करोण रूपये का प्रावधान उच्च शिक्षा के लिए तय किया |ताकि चीन, रूस,अमेरिका,ब्राजील की भाति भारत भी शिक्षा का स्तर ऊँचा उठा सके और २१वि सदी का सपना पूरा कर सके|मगर अफ़सोस की बात यह है की यह सब मानक जिनके लिए तय किया जाता है वह भविष्य के कर्णधार आज भी उन्ही गंदे ,मलिन बस्तियों ,तालाबों या फिर रेलवे ट्रेक के किनारे पुरे शहर के कूड़े को उठाकर एक वक्त के लिए रोटी-नमक का इंतजाम कर पाते है |जिनके हाथो में कलम होनी चाहिए उनके हाथ शहर की गंदगी से सने पड़े है|ऐसी स्थिति में "सर्व शिक्षा अभियान "मुक्त ,व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की सफलता की माला जपना कहा तक सही है|जबकि यही बच्चे हमारे समाज की "नीव "है |और अगर ये दिन -रत सिर्फ बोरियों में कूड़ा ही बीन रहे होंगे तो उनसे की जाने वाली उम्मीदें भी कूड़े के ढेर में समाधी ले लेंगी|अतः आवश्यकता है की सरकार के अतिरिक्त हम सब भी मिलकर छोटे -छोटे प्रयास करे की इस समस्या का कोई विकल्प निकल सके |                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           यशस्वी द्विवेदी