Friday, 7 March 2014

                                   
  मेरे मन की नन्हीं चिड़िया ...
नन्हीं सी चिड़िया ...कोमल सी चिड़िया
चंचल चिड़िया ...छोटी चिड़िया
कुछ –कुछ चीजे खोजती चिड़िया
उनसे अपने हर दिन को बुनती चिड़िया |
बरगद के नीचे ,घुमती चिड़िया
मिट्टी से बातें करती चिड़िया
चंचल चिड़िया नटखट चिड़िया
पत्तों से घर को रंगती चिड़िया 
डालियों को सपनों सुनाती चिड़िया |
गीली मिट्टी की दोस्त हैं चिड़िया
अपने मन का होश  हैं चिड़िया
पंखो में  दुनिया बसाती चिड़िया
तारों को झूला झुलाती चिड़िया |
हर मन की हलचल हैं चिड़िया
चंचल चिड़िया ...छोटी चिड़िया
(यशस्वी )
४/३/१४



Tuesday, 4 February 2014

( रात से गहरी दोस्ती के ख्याल ने कुछ यूँ आवाज दी ...की रात हैं .....)

रात हैं ......
लग रहा है ...रात है 
रात की आवाज पे मत जाओ 
न ही इसके लिबास पर 
रात क्या तभी रात होती हैं ?
जब ,
अँधेरा होता है
जब सन्नाटा छाता है
जब ,
घरों में लोग चुपचाप करवटें बदलते हैं
जब , सड़कों पे हर पल लोग ठिठुरते हैं |
या फिर
जब चूल्हे से घर में उजाला होता हैं
ढिबरी की लौ -तले
बैठा भविष्य का उम्मीदवार होता हैं
या फिर तब ,
जब आँखों को भीचतें ,
पन्नों को जबरन पलटते
अनचाहे मन से पानी के छीटों को
हर दूसरा बन्दा अपने पलकों में भरता हैं
क्या तभी रात होती हैं ...???
पता नहीं कितने हाँ हैं
इसे बयां करने की खातिर
शायद ,
मायने खिसक रहे हैं
भरी रोशनी के नीचे
शोर –हँसी ,ठहाकों में
आधी –आधी रात को |
जिन्दगी को जीते
रात के हर पहर से
उसका हक़ छिनते हुए |
दिख रहा है ....
रात उदास बैठी हैं
मेरे सामने
अपने आँखों के काजल को
नर्म हाथों से कुरदते
होठों के स्याहीपन से
कुछ बुदबुदाते
घूर कर देखती मुझको
कह रही है ----
मैं रात हूँ .....मुझे रात ही रहने दो |

(यशस्वी )

Monday, 18 November 2013

( एक नीम के पेड़ को अकेले लहलहाते हुए देख कर )

जब भी आता हैं आँखों के सामने
तुम्हारे लहराते पत्तियों का चंचल हरा गुच्छा
सचमुच ,
मेरे मन की खुबसुरती काफी बढ़ जाती हैं |
हजारों रूप –रंग ,भावनाओं को समेटे
कभी धीमे से तो कभी चुप होकर
सहमते हुए कुछ बताना चाहते हो तुम
शायद |
तुम्हारे बगल में खड़े ,गहरे हरे पेड़ की
मचलती पत्तियों से क्या बातें कर रहे हो तुम ?
जरुर कोई खास बात हैं
जोकि
तुम ऊपर उठे और वो झुक कर
कोशिश कर रही हैं तुम्हे सुनने की |
काफी हद तक तुम कुछ कहना चाहते हो
हर उस इन्सान को जो तुम्हारे नीचे से
होकर गुजरता हैं हर ऱोज
निहारता हैं दूर से
शायद कुछ कोरी बाते हैं
जो तुम्हारे ही काग़ज पर आये बिना निशब्द हैं |
तुम्हे तुम्हारी जगह लाने  के लिए
फरसे से लगातार कोशिस करते हैं हम
घास हटाते ,बीज डालते और पौधे लगा कर
शायद ....शायद हमारे स्वार्थ पर ही
कहना चाहते हो कुछ तुम
हमेशा कोशिश करते रहते हो 
हर तरह से
मगर तब तक उसी फरसे से
तुम्हे मिटटी में मिला देते हैं हम |
(यशस्वी दिवेदी )


Wednesday, 17 April 2013

लम्बी कतार .....


Monday, 11 March 2013

एक गुजारिश ...




तुम्हारे चेहरे  की  हर लकीर का मतलब खूब समझ जाती हूं  मैं
तुम कहो  न कहो
उसपे हलकी सी  ख़ुशी का भीगा समन्दर
लहरों की करवटों की सुनी आवाज
मेरे  साहिल को सुलझा जाती हैं
लेकिन शर्त बस इतनी सी हैं
कि चेहरा दिखा  दिया करो |

यशस्वी ...

Monday, 28 January 2013

कुछ कच्चे -पक्के ख्याल ....आपके साथ


रात के आशियाने में एक चमक सी देखी
एक टूटे तारे की झलक सी देखी
मकसद ये नही था की कुछ मांगना  चाहती थी
मैं उससे जो खुद किसी और के लिए टूटा था
मैं तो तलाश रही थी खुद की झलक
जिसमे सिर्फ मैं और मेरी झलक का जूनून था
कुछ जुगनू आये और आते रहे
कुछ का नामो - निशान
अभी भी उस गुम -सुम पेड़ पे अटका हैं
जहा कभी उनका गुलज़ार होता था
एतबार होत़ा था
एक अधूरी सी कहानी हिसाब
मांगती हैं उन सारे  बिखरे पलों का
जब हम दोनों साथ बैठे थे
जहा वो थी मेरी सहेली मगर मैं उसकी कोई नही
खुली किताब का हर पन्ना ,हर पल
एक आहट  के साथ आकर सिकुड़ जाता हैं
जहा मैं अपनी तन्हाईयों मैं खो जाती हूं
है जरा चंचल सा मन मगर ,कठोर नही
बीएस हर  आश  को पूरा करना करना
और उसमे जी लेना चाहती हूँ
एक हलकी सी छुवन ,उस नर्म   पौधे की
जो खुद ही सिसक रहा हैं
पाने को बेताब नही मगर
उससे रु -बरु  होना चाहती हूँ
शायद ,
निर्भय मन की ये एक और ख्वाहिश हैं
एक पैगाम हैं ये आखिरी तो नही
मगर हा आखिरी से कम भी नही,,,,,
                                                                यशस्वी दिवेदी


Thursday, 1 March 2012

आवाज दो तुम खुद को आज

                                                                         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
     
          सोई हुई  है सोच क्यों ..
         दबे -दबे क्यों है आरमान
         इनको कब तुम जागाओगे
        तुम बहुत कुछ  कर ले जाओगे  

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।
      
         सपनो की दुनिया सपनो तक
         बस यूँ  ही न सीमित रहे
         खाली पूरी जमीन पर बस लिख दो
          तुम अपना ही नाम

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         क्यूँ  किये है बंद इसके किवाड़
         आओ खोल दो इन्हें तुम आज
         किस बात का है इंतजार
   
         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

         बस नाम का मत काम करो
         काम से ही नाम करो
         फिर देखो क्या होता है आज

         आवाज दो तुम  खुद को आज
         आवाज दो तुम खुद को आज ।

            बस एक कदम की  दूरी पर  
            है खड़ी तुम्हारी  मंजिले
            बढ़ा दो  ना  तुम ये  कदम
            क्यू थमे -थमे है ये पड़े

          आवाज दो तुम  खुद को आज
          आवाज दो तुम खुद को आज ।

             पूरी श्रृंखला तुम्हारे बिन
            सूनी-सूनी है पड़ी हुई
            एक उंगली बढ़ा कर तुम
            करते नही हो क्यूँ आगाज

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

           सीमित सजा है ये गगन
           सीमित  पड़ी है ये धरा
           सिमटी हुई  है  साडी दिशा
           तुमसे ही है इनका विस्तार

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज ।

             डाल  दो हौसले का रंग
             उड़ेल दो अपना प्रयास
             हर तरफ जगमगायेगा बस
             बस तुम्हारा ही तुम्हारा प्रयास

           आवाज दो तुम  खुद को आज
           आवाज दो तुम खुद को आज  

        ( आज कुछ ऐसा ही ख्याल आया की हम अपनी ही आवाज को क्यों नही सुनने की कोशिश     
        करते  जबकि हम चाहते है की दुनिया हमारी  आवाज को पूरी तरह सुने ...सच मे कितना  
         अजीब सोच लेते   है कभी -कभी हम ।।_)